दो साल पुराने विवाद में पलटा फैसला, पुलिसकर्मियों पर FIR के आदेश पर रोक
दतिया। जिले के बहुचर्चित सिनावल थाना विवाद मामले में पुलिस विभाग को बड़ी कानूनी राहत मिली है। करीब दो वर्ष पुराने इस प्रकरण में तत्कालीन थाना प्रभारी अरविंद भदौरिया एवं अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने संबंधी न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी (JMFC) के आदेश को अपर सत्र न्यायालय ने निरस्त कर दिया है। अदालत ने पुलिस अधिकारी की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए अधीनस्थ न्यायालय के आदेश को विधिसम्मत नहीं माना।
जानकारी के अनुसार, यह मामला मार्च 2024 में हुई एक पुलिस कार्रवाई से जुड़ा हुआ है। उस समय सिनावल थाना पुलिस धोखाधड़ी के एक प्रकरण में आरोपी माधव सिंह बुन्देला की तलाश कर रही थी। पुलिस टीम आरोपी की गिरफ्तारी के उद्देश्य से उसके निवास पर पहुंची थी। पुलिस का दावा था कि कार्रवाई के दौरान आरोपी पक्ष के लोगों ने शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाते हुए पुलिस बल के साथ अभद्रता और हमला किया था। इस घटना के बाद पुलिस ने संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया था।
इसी घटनाक्रम को लेकर आरोपी पक्ष की ओर से अलग कानूनी लड़ाई शुरू की गई। माधव सिंह बुन्देला के पुत्र युवराज सिंह बुन्देला ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके घर में घुसकर मारपीट की और अवैध कार्रवाई की। उन्होंने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत आवेदन प्रस्तुत कर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपराध दर्ज करने की मांग की थी।
प्रकरण की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने आवेदन को खारिज कर दिया था, लेकिन बाद में पुनरीक्षण न्यायालय के निर्देशों के बाद मामले पर पुनः विचार किया गया। इसके पश्चात जून 2026 में न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी ने तत्कालीन थाना प्रभारी अरविंद भदौरिया तथा अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 452, 323 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी कर दिया था। इस आदेश के सामने आने के बाद पुलिस महकमे में हलचल मच गई थी।
हालांकि, पुलिस पक्ष ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अपर सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारी की ओर से अधिवक्ताओं ने यह तर्क रखा कि संबंधित कार्रवाई पुलिस द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान की गई थी तथा मामले के तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों को पर्याप्त रूप से परखा नहीं गया था।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद अपर सत्र न्यायाधीश राजेश भण्डारी ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। न्यायालय ने माना कि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित आदेश में कानूनी त्रुटियां हैं और इसे बनाए रखना उचित नहीं होगा। इसके साथ ही एफआईआर दर्ज करने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया गया।
अदालत के इस फैसले को पुलिस विभाग के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। वहीं, यह निर्णय इस मामले में चल रहे कानूनी विवाद का नया अध्याय भी खोलता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शिकायतकर्ता पक्ष आगे उच्च न्यायालय का रुख करता है या नहीं। फिलहाल अपर सत्र न्यायालय के आदेश के बाद पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने का रास्ता बंद हो गया है।

