पाकिस्तान के सिंध से दतिया पहुंची संत हजारीराम की अखंड ज्योति, विभाजन की पीड़ा और आस्था की बनी प्रतीक
दतिया। सिंधी समाज का आस्था और श्रद्धा से जुड़ा वार्षिक ज्योति स्नान पर्व आज दतिया में धार्मिक उत्साह और भव्यता के साथ मनाया जा रहा है। इस आयोजन में देशभर से सिंधी समाज के श्रद्धालु दतिया पहुंचे हैं। संत हजारीराम मंदिर, जिसे ज्योति मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, से अखंड ज्योति को भव्य जुलूस के रूप में करण सागर तालाब तक ले जाया जाएगा, जहां विधि-विधान से ज्योति का स्नान कराया जाएगा। इसके बाद पवित्र ज्योति को पुनः ज्योति मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाएगा।
दतिया में प्रज्वलित यह अखंड ज्योति केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि भारत-पाकिस्तान विभाजन की ऐतिहासिक पीड़ा, विस्थापन और सिंधी समाज की अपनी संस्कृति एवं आस्था को बचाए रखने के संघर्ष की भी प्रतीक मानी जाती है।
पाकिस्तान के सिंध से जुड़ी है ज्योति की कहानी
संत हजारीराम की इस पवित्र ज्योति की कथा पाकिस्तान के तत्कालीन सिंध क्षेत्र के बरदाड़े गांव से जुड़ी बताई जाती है। प्रकाशित विवरणों के अनुसार संत हजारीराम का जन्म लगभग 220 वर्ष पूर्व सिंध के बरदाड़े गांव में रतनलाल जी के घर हुआ था। वे बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे और संत दादूराम आश्रम में सेवा किया करते थे।
लोकमान्यता के अनुसार संत हजारीराम प्रतिदिन नदी से आश्रम के लिए जल लेकर आते थे। एक दिन वे नदी की तेज धारा में चले गए। उनके नदी में समा जाने की खबर से गांव में शोक और चिंता फैल गई। ग्रामीणों ने उनकी सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थना शुरू कर दी। करीब नौ दिन बाद संत हजारीराम जल से जलती हुई अखंड ज्योति के साथ प्रकट हुए। इस अद्भुत घटना के बाद श्रद्धालुओं ने उन्हें वरुण अवतार के रूप में श्रद्धा दी और संत साधुराम ने उस ज्योति को निरंतर प्रज्वलित रखने का संकल्प समाज को दिलाया।
मान्यता है कि तभी से यह ज्योति लगातार प्रज्वलित है और सिंधी समाज में इसे संत हजारीराम की पवित्र धरोहर के रूप में पूजा जाता है।
विभाजन के समय भारत पहुंची पवित्र ज्योति
1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान सिंध से बड़ी संख्या में सिंधी परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर भारत आना पड़ा। इसी दौर में संत हजारीराम से जुड़ी इस पवित्र ज्योति को भी सुरक्षित रूप से भारत लाया गया।
उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के अनुसार विभाजन के बाद यह ज्योति मध्य प्रदेश के दतिया जिले में लाई गई और गाड़ी खाने के पास स्थित संत हजारीराम मंदिर में स्थापित की गई। तब से यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित बताई जाती है।
हालांकि उपलब्ध स्रोतों में ज्योति को दतिया लाने वाले व्यक्ति का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं मिलता। इसलिए इस संबंध में स्थानीय सिंधी समाज के बुजुर्गों अथवा मंदिर से जुड़े प्रामाणिक अभिलेखों से जानकारी की पुष्टि किया जाना अधिक उचित होगा।
क्यों मनाया जाता है ज्योति स्नान पर्व?
संत हजारीराम की अखंड ज्योति को प्रतिवर्ष स्नान कराने की परंपरा इसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मान्यता से जुड़ी है। सिंधी समाज इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संत हजारीराम की स्मृति और उनकी पवित्र ज्योति के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर मानता है।
ज्योति स्नान के दौरान अखंड ज्योति को अत्यंत श्रद्धा और सावधानी के साथ मंदिर से बाहर लाकर जलाशय तक ले जाया जाता है। वहां विधि-विधान से उसका स्नान कराया जाता है और फिर पुनः मंदिर में स्थापित किया जाता है। प्रकाशित विवरणों के अनुसार इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से सिंधी समाज के संत, धर्मगुरु और श्रद्धालु दतिया पहुंचते हैं तथा कई श्रद्धालु मंदिर में रहकर नौ दिन तक आराधना भी करते हैं।
आस्था, विरासत और विस्थापन की याद
दतिया की यह ज्योति सिंधी समाज के लिए इसलिए भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि इसमें उनकी धार्मिक आस्था के साथ-साथ विभाजन के समय छूटे घर, जन्मभूमि और संस्कृति की स्मृतियां भी जुड़ी हैं। पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से भारत आई यह ज्योति आज दतिया में सिंधी समाज की एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुकी है।
आज ज्योति स्नान पर्व के अवसर पर जब यह पवित्र ज्योति भव्य जुलूस के साथ करण सागर तक पहुंचेगी, तो यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं होगी, बल्कि लगभग आठ दशक पुरानी उस विरासत की पुनर्स्मृति भी होगी, जिसे विभाजन की परिस्थितियों के बीच सिंधी समाज अपने साथ भारत लेकर आया था। दतिया में हर वर्ष होने वाला यह आयोजन देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं को संत हजारीराम की परंपरा से जोड़ता है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का माध्यम भी बनता है।

