सिंध नदी में अवैध रेत उत्खनन का आरोप, रिद्धि-सिद्धि कंपनी पर कार्रवाई की मांग
खमरौली-नानट से लेकर अन्य घाटों तक अवैध खनन का दावा, कलेक्टर और एसपी से शिकायतकर्ता ने मांगा जवाब
दतिया | विशेष समाचार
सिंध नदी का सीना चीरकर रेत निकालने का आरोप, एनजीटी के नियमों की अनदेखी और करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान का दावा—सेवढ़ा तहसील में रेत उत्खनन को लेकर प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। रिद्धि-सिद्धि कंपनी के विरुद्ध अवैध रेत उत्खनन कराने के आरोप लगाते हुए शिकायतकर्ता ने दतिया कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से तत्काल छापामार कार्रवाई करने तथा संबंधित खदानों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
ऑल इंडिया धनगर समाज महासभा, मध्य प्रदेश के युवा प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व सरपंच एवं भाजपा कार्यकर्ता होल्कर रिशपाल सिंह बघेल ने आरोप लगाया है कि थाना अतरैटा क्षेत्र के ग्राम खमरौली के अंतर्गत ग्राम नानट में सर्वे क्रमांक 332 से सिंध नदी के भीतर जेसीबी मशीनों और कथित पनडुब्बी मशीनों के माध्यम से रेत निकाली जा रही है। उनका दावा है कि संबंधित स्थल पर खनिज विभाग की वैध स्वीकृति की स्थिति की जांच की जानी चाहिए और यदि उत्खनन नियमों के विरुद्ध पाया जाता है तो तत्काल मशीनें जब्त कर कानूनी कार्रवाई की जाए।
सर्वे नंबर 332 और 825 पर उठाए सवाल
शिकायतकर्ता ने ग्राम नानट के सर्वे क्रमांक 332 तथा खमरौली के सर्वे क्रमांक 825 के भाग-बी में कथित अवैध उत्खनन का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि सर्वे क्रमांक 825 के संबंधित हिस्से को लेकर एनजीटी के आदेशों की स्थिति और उनके अनुपालन की जांच जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बावजूद वहां रेत निकासी की जा रही है।
बघेल ने सेवढ़ा क्षेत्र के रूहेड़ा, भीकमपुर, कंजौली और बाड़ेतर घाट सहित सिंध नदी के अन्य रेत घाटों पर भी कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि प्रशासन को प्रत्येक घाट की स्वीकृत सीमा, खनन की मात्रा, पर्यावरणीय शर्तों और परिवहन व्यवस्था का भौतिक सत्यापन करना चाहिए।
“सूचना के बाद भी कार्रवाई केवल निरीक्षण तक सीमित क्यों?”
शिकायतकर्ता ने जिला प्रशासन, खनिज विभाग, स्थानीय राजस्व अधिकारियों और संबंधित पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अवैध उत्खनन की शिकायतों के बाद भी प्रभावी कार्रवाई के बजाय केवल निरीक्षण कर लौटने की स्थिति बनती है।
उन्होंने अधिकारियों और रेत कारोबार से जुड़े लोगों के बीच कथित मिलीभगत के आरोप भी लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। संबंधित अधिकारियों और कंपनी का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
तीन साल से पौधरोपण कहां? पर्यावरणीय शर्तों पर भी सवाल
बघेल ने आरोप लगाया कि कंपनी द्वारा पिछले तीन वर्षों में पर्यावरण संरक्षण के लिए अपेक्षित पौधरोपण और अन्य उपायों का पर्याप्त रिकॉर्ड सामने नहीं आया है। उन्होंने खदानों के आसपास पौधरोपण, तार फेंसिंग, पौधों की नियमित सिंचाई तथा पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन की जांच कराने की मांग की है।
उनका कहना है कि रेत से भरे ट्रैक्टरों, डंपरों और अन्य वाहनों की आवाजाही से उड़ने वाली धूल तथा खनन गतिविधियों से नदी के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन होना चाहिए। नदी के पानी और आसपास के पशुओं पर संभावित प्रभाव को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई है।
राजनीतिक संरक्षण के आरोप, निष्पक्ष जांच की मांग
शिकायतकर्ता ने कुछ भाजपा जनप्रतिनिधियों और रेत कारोबार से जुड़े लोगों के बीच कथित सांठगांठ के आरोप भी लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि स्थानीय स्तर पर रेत खदानों के संचालन में प्रभावशाली लोगों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। इन आरोपों के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेजों, वीडियो और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण जांच एजेंसी द्वारा किया जाना आवश्यक है।
बघेल ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को बिना जांच दोषी ठहराना नहीं, बल्कि कथित अवैध उत्खनन की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार पाए जाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित कराना है।
29 अक्टूबर को भोपाल में शिकायत और आगे न्यायालय जाने की चेतावनी
होल्कर रिशपाल सिंह बघेल ने चेतावनी दी है कि यदि शिकायत पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो वे 29 अक्टूबर 2026 को भोपाल में शासन के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष दस्तावेजों, फोटो और वीडियो सहित शिकायत प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक और अन्य संबंधित अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग करने की बात कही है। साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ में याचिका दायर करने की भी बात कही है।
अब प्रशासन के सामने ये प्रमुख सवाल
- क्या संबंधित घाटों की खनन स्वीकृति, सीमांकन और वैधता की दोबारा जांच कराई जाएगी?
- क्या एनजीटी के लागू आदेशों और पर्यावरणीय शर्तों के पालन का सत्यापन होगा?
- क्या कथित अवैध उत्खनन में प्रयुक्त मशीनों और परिवहन वाहनों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होगी?
- क्या पौधरोपण, पर्यावरणीय अनुपालन और शासन को प्राप्त राजस्व का रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के दायरे में आएगा?
- क्या शिकायत में लगाए गए मिलीभगत के आरोपों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि उत्खनन वैध है तो संबंधित स्वीकृतियों और पर्यावरणीय अनुपालन का रिकॉर्ड सामने आना चाहिए, और यदि अवैध उत्खनन हो रहा है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए?

